सीख
डमरू सृष्टि की आदि ध्वनि का प्रतीक क्यों है
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शिव के लगभग किसी भी चित्र को ध्यान से देखें, तो उनके एक हाथ में एक छोटा-सा वाद्य दिखाई देगा। उसका आकार रेतघड़ी जैसा होता है और उसके बीच के सँकरे भाग से दो डोरियों पर छोटी-छोटी गोटियाँ लटकती हैं। इस पर ध्यान न जाना या इसे केवल सजावट समझ लेना स्वाभाविक है। लेकिन परंपरा में यह उनके सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीकों में से एक है।
यह वाद्य डमरू है। यह उस आदि ध्वनि का प्रतीक है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसी से समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ।
डमरू क्या है
डमरू एक छोटा, दो मुखों वाला वाद्य है, जो दोनों सिरों पर चौड़ा और बीच में सँकरा होता है। इसके बीच के सँकरे भाग से दो छोटी डोरियाँ लटकती हैं, जिनके सिरों पर गोटियाँ या गाँठें होती हैं। इसे एक हाथ में पकड़कर कलाई को बारी-बारी से दोनों ओर घुमाने पर गोटियाँ झूलती हैं और दोनों ओर मढ़े हुए चमड़े पर बारी-बारी से चोट करती हैं। इससे एक अकेली थाप नहीं, बल्कि तेज़, लगातार डम-डम की ध्वनि निकलती है।
डमरू आपको मंदिरों की मूर्तियों और चित्रों में शिव के हाथों में, घूम-घूमकर प्रदर्शन करने वाले कलाकारों और साधुओं के पास, तथा मंदिरों के कुछ अनुष्ठानों में दिखाई देगा। केरल के मंदिर-संगीत में आपको इसी तरह रेतघड़ी के आकार का एक वाद्य, इडक्का, सुनने या देखने को मिल सकता है। हालाँकि वह एक अलग वाद्य है और उसे बजाने की अपनी विधि है।
शिव के स्वरूप में डमरू कहाँ दिखाई देता है
नृत्य के अधिपति नटराज के रूप में शिव अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में डमरू धारण करते हैं। उसी स्वरूप में उनके ऊपर वाले बाएँ हाथ में अग्नि की ज्वाला होती है। इस प्रतिमा के अर्थ को समझने वाले अनेक लोग इन दोनों को एक ही विचार के संतुलित पक्ष मानते हैं:
- डमरू सृजन का प्रतीक है—वह ध्वनि जिससे आरंभ होता है।
- ज्वाला संहार का प्रतीक है—वह अग्नि जिसमें अंत होता है।
इन दोनों के बीच, शेष हाथों और पैरों के भी अपने अर्थ हैं। एक हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। एक पैर अनुग्रह के भाव में उठा है और दूसरा एक छोटी आकृति पर टिका है, जिसे आम तौर पर अज्ञान का प्रतीक माना जाता है। सूक्ष्म विवरणों को लेकर आचार्यों की व्याख्याएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन मूल भाव एक ही है। सृजन और संहार, दोनों उसी एक नृत्य में समाए हैं, और उसका आरंभ डमरू से होता है।
सृष्टि से पहले की ध्वनि
भारतीय चिंतन में नाद ब्रह्म का एक प्राचीन विचार है, जिसका अर्थ है, “ध्वनि ही ब्रह्म है।” इस दृष्टि से संसार का आरंभ किसी वस्तु से नहीं, बल्कि एक स्पंदन से हुआ। पहले ध्वनि आई और उसके बाद रूप प्रकट हुआ।
डमरू इसी विचार का दृश्य प्रतीक है। कथा के अनुसार, जब शिव डमरू बजाते हैं, तो सृष्टि का विस्तार होने लगता है। इसीलिए अनेक लोग इसे ॐ से जोड़ते हैं, उस पवित्र अक्षर से जिसे प्रायः आदि ध्वनि कहा जाता है। यदि आपने ॐ के जप पर हमारा लेख पढ़ा है, तो यह संबंध स्पष्ट होगा। ॐ को वह ध्वनि माना जाता है जिसमें सभी ध्वनियाँ समाई हैं, और डमरू वह वाद्य है जो उसे अपनी थाप में व्यक्त करता है।
ब्रह्मांड का व्याकरण
एक सुंदर परंपरा डमरू को स्वयं भाषा से जोड़ती है। उसके अनुसार, शिव के नृत्य के बाद डमरू की ध्वनि से वर्णों के चौदह समूह प्रकट हुए। इन्हें माहेश्वर सूत्र या शिव सूत्र कहा जाता है, और इनका आरंभ अ, इ और उ स्वर-ध्वनियों से होता है।
परंपरा कहती है कि प्राचीन वैयाकरण पाणिनि को ये ध्वनियाँ प्राप्त हुईं और उन्होंने इन्हें अपने संस्कृत व्याकरण का आधार बनाया। इतिहासकार इसे व्याकरण की उत्पत्ति से जुड़ा एक श्रद्धापूर्ण आख्यान मानते हैं, लेकिन इसका संदेश याद रखने योग्य है: जिस भाषा में शास्त्र रचे गए, उसकी संरचना का मूल भी डमरू की थाप में देखा गया है।
रेतघड़ी जैसा आकार क्यों?
इस आकार की कई व्याख्याएँ हैं। उनमें से कुछ को जानना उपयोगी है:
- दो त्रिकोणों का मिलन। यह आकार दो ऐसे त्रिकोणों जैसा दिखता है जिनके शीर्ष आपस में मिलते हैं। कुछ लोग इन्हें दो तत्त्वों का प्रतीक मानते हैं, जैसे पुरुष और स्त्री, या सूर्य और चंद्रमा, जो एक ही बिंदु पर मिलते हैं।
- समय। रेतघड़ी बीतते समय का प्रतीक भी है। डमरू का संबंध समय के स्वामी महाकाल से है, और उसकी लय को स्वयं काल के स्पंदन के रूप में देखा जाता है।
- ध्वनियों के बीच का मौन। किसी थाप का अर्थ तभी है, जब उसके पहले और बाद में नीरवता हो। कुछ आचार्य डमरू के सँकरे मध्य भाग को उस स्थान का प्रतीक बताते हैं जहाँ ध्वनि और मौन मिलते हैं।
इनमें से किसी एक को ही एकमात्र सही उत्तर नहीं कहा जा सकता। ये उसी आकार को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।
हमारे लिए इसका क्या अर्थ है
इस प्रतीक से कुछ उपयोगी सीखने के लिए सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यताओं पर विश्वास करना आवश्यक नहीं है। मनन के लिए कुछ सरल बातें:
- सजगता से शुरुआत करें। इस प्रतीक में सृजन का आरंभ किसी प्रयास से नहीं, एक ध्वनि से होता है। अनेक लोगों का अनुभव है कि जब दिन की शुरुआत भागदौड़ के बजाय कुछ मिनट ध्यान से सुनने में होती है, तो दिन बेहतर बीतता है।
- लय का महत्त्व है। डमरू केवल एक ध्वनि नहीं निकालता, वह लयबद्ध स्पंदन पैदा करता है। रोज़ का अभ्यास, जैसे रोज़ का जप, भी इसी तरह काम करता है—छोटे-छोटे दोहराव धीरे-धीरे स्थिरता लाते हैं।
- सब कुछ दो थापों के बीच समाया है। डमरू के दो मुख होते हैं और कोई भी अकेले उसका काम पूरा नहीं करता। इस परंपरा के अनेक विचार भी ऐसे ही हैं: सृजन और अंत, प्रयास और विश्राम, वाणी और मौन।
एक छोटा-सा अभ्यास
दो मिनट के लिए यह करके देखें:
- आराम से बैठें और आँखें बंद कर लें।
- आसपास की आवाज़ों को मन में उनका नाम दिए बिना सुनें—सड़क पर वाहनों की आवाज़, पंखे की ध्वनि, किसी पक्षी का स्वर।
- ध्यान दें कि हर ध्वनि कैसे शुरू होती है और धीरे-धीरे विलीन हो जाती है। उसके आसपास की नीरवता को भी महसूस करें।
- चाहें तो साँस छोड़ते समय धीमे स्वर में ॐ का उच्चारण करें और सुनें कि उसकी ध्वनि कैसे विलीन होती है।
यह उस सीख का एक छोटा-सा अभ्यास है जो डमरू से जुड़ी मानी जाती है: हर ध्वनि मौन से जन्म लेती है और उसी में लौट जाती है।
इसकी सीख
डमरू छोटा है, इसलिए उस पर ध्यान न जाना आसान है। लेकिन उसमें परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन विचार समाया है: संसार का आरंभ ध्वनि से होता है, लय अस्तित्व के केंद्र में है, और मौन भी संगीत का हिस्सा है।
क्या आप इस ध्वनि को और गहराई से समझना चाहेंगे? पढ़ें: शिव-पूजा में “ॐ” का जप क्यों महत्त्वपूर्ण है।
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