कथाएँ
शिव और तांडव: संहार और सृष्टि का नृत्य
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शिव के सभी रूपों में एक ऐसा है जो बाकी सभी से अधिक दूर-दूर तक पहुँचा है। चार भुजाओं वाली एक आकृति, जो अग्नि के घेरे के भीतर नृत्य कर रही है। एक पैर उठा हुआ है और दूसरा झुकी हुई एक छोटी-सी आकृति को दबाए हुए है। यह रूप आपको मंदिरों, संग्रहालयों और घरों के बैठक कक्षों में मिलेगा। एक खास उदाहरण यूरोप की एक प्रसिद्ध भौतिकी प्रयोगशाला का भी है, जहाँ भारत की ओर से उपहार में दी गई नृत्य करते शिव की प्रतिमा स्थापित है।
इस रूप को नटराज, यानी "नृत्य के अधिपति" कहा जाता है, और इस नृत्य को तांडव। यह कथा बताती है कि इसकी शुरुआत कहाँ से हुई, अलग-अलग नृत्य रूपों के क्या अर्थ माने जाते हैं और यह रूप इतने लंबे समय से इतने लोगों को क्यों आकर्षित करता रहा है।
इस परंपरा की अधिकांश कथाओं की तरह, इसके भी एक से अधिक संस्करण हैं। अलग-अलग पुराणों, क्षेत्रों और मंदिर परंपराओं में इसके वर्णन अलग हैं। यहाँ कथा की वह रूपरेखा दी गई है जो व्यापक रूप से प्रचलित है।
दो नृत्य, एक नर्तक
परंपरा में तांडव के एक से अधिक रूपों का उल्लेख मिलता है, और यह नाम मुख्य रूप से दो अर्थों में इस्तेमाल होता है।
पहला है उग्र रूप, रुद्र तांडव—प्रलय का नृत्य। इस रूप में शिव प्रचंड वेग से नृत्य करते हैं, और जिस संसार में वे नृत्य कर रहे होते हैं, उसका अंत हो रहा होता है। यह उस देवता का नृत्य है जो संहार करता है, जो अपना समय पूरा कर चुकी चीज़ों को हटा देता है।
दूसरा है आनंद तांडव, आनंद का नृत्य। प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमाओं में यही रूप दिखाई देता है। यह सुंदर, संतुलित और शांत है। यह सृष्टि, पालन और मुक्ति का नृत्य है, जो एक ही मुद्रा में समाए हुए हैं।
ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों नृत्य करने वाला एक ही है, और कई लोग इसका अर्थ यह समझते हैं कि अंत और आरंभ एक ही प्रवाह के हिस्से हैं।
इस शब्द के बारे में भी एक बात जानने लायक है। कुछ परंपराएँ तांडव शब्द को शिव के अनुचर तंडु से जोड़ती हैं। कहा जाता है कि तंडु ने नाट्य और नृत्य के प्राचीन ग्रंथ नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि को यह नृत्य सिखाया था। इस तरह परंपरा शिव और शास्त्रीय कलाओं के संबंध को समझाती है, हालाँकि इसके विवरण अलग-अलग मिलते हैं।
वन के ऋषियों की कथा
इस नृत्य की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक दारुक वन में शुरू होती है। वहाँ कुछ ऋषि रहते थे, जिन्हें अपने ज्ञान और अनुष्ठानों की शक्ति पर गर्व था। प्रचलित कथाओं के अनुसार, उनका मानना था कि केवल अनुष्ठान ही पर्याप्त हैं और उन्हें ऐसे किसी देवता की आवश्यकता नहीं है जो नियमों से परे विचरण करता हो।
शिव एक अनोखा वेश धरकर वन में आए—अत्यंत सुंदर, घूमते-फिरते भिक्षुक के रूप में। उनके साथ एक और रूप था, जिसे अक्सर मोहिनी रूप में विष्णु माना जाता है। ऋषि और उनकी पत्नियाँ विचलित हो उठे, और ऋषियों को क्रोध आ गया। अपने अनुष्ठानों से उन्होंने खतरनाक जीव उत्पन्न किए और उस अजनबी पर छोड़ दिए: एक बाघ, एक सर्प और एक भयंकर बौने जैसा प्राणी।
शिव तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने बाघ की खाल को वस्त्र बना लिया और सर्प को आभूषण की तरह गले में लपेट लिया। अंतिम प्राणी को, जिसे प्रायः अपस्मार और तमिल परंपरा में मुयलकन कहा जाता है, उन्होंने उसकी पीठ पर पैर रखकर वश में कर लिया। फिर उसी प्राणी पर खड़े होकर शिव नृत्य करने लगे।
ऋषि देखते रहे और उनका अभिमान मिट गया। वे समझ गए कि उनके सामने कौन है और उन्होंने शिव को प्रणाम किया।
ग्रंथ और क्षेत्र के अनुसार कथा के विवरण बदलते हैं। कुछ संस्करणों में यह प्रसंग अधिक लीलामय है, तो कुछ में अधिक कठोर। मूल बात वही रहती है: देवता ने अहंकार का उत्तर तर्क से नहीं, नृत्य से दिया।
पैर के नीचे कौन है?
शिव के दाएँ पैर के नीचे की छोटी-सी आकृति इस पूरी प्रतिमा के सबसे अधिक चर्चित पहलुओं में से एक है। इसे आम तौर पर अपस्मार या मुयलकन कहा जाता है। कई व्याख्याओं में यह अज्ञान, विस्मृति या अहंकार का प्रतीक है—हमारे भीतर का वह हिस्सा जो अपनी सीमित पहचान से चिपका रहता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि शिव इस आकृति को नष्ट नहीं करते। वे उस पर हल्के से पैर रखकर खड़े हैं। उसके ऊपर नृत्य चलता रहता है।
अलग-अलग गुरु इसकी अलग-अलग व्याख्याएँ कर सकते हैं। कुछ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अज्ञान को वश में करना आवश्यक है। दूसरे बताते हैं कि उसे केवल दबाकर रखा गया है, कुचला नहीं गया। दोनों व्याख्याएँ परंपरा में मिलती हैं, और किसी एक को अंतिम मानने के बजाय दोनों के लिए जगह रखना उपयोगी है।
प्रतिमा के प्रतीकों को समझना
नटराज की पारंपरिक कांस्य प्रतिमा, जिसे अक्सर दक्षिण भारत के चोल काल से जोड़ा जाता है, बारीकियों से भरी है। अनेक गुरु इसके हर अंग में एक अर्थ देखते हैं। यहाँ एक प्रचलित व्याख्या दी गई है। ध्यान रखें कि व्याख्याएँ अलग-अलग हो सकती हैं।
- ऊपर के दाएँ हाथ में डमरू। इस छोटे वाद्य को सृष्टि की ध्वनि से जोड़ा जाता है। डमरू पर हमारे पाठ में हम इसे विस्तार से समझते हैं।
- ऊपर के बाएँ हाथ में अग्नि। अग्नि को संहार से जोड़ा जाता है, उस शक्ति से जो मिटाकर जगह खाली करती है। यह दूसरी ओर के डमरू के साथ संतुलन बनाती है।
- उठी हुई हथेली, अभय मुद्रा। नीचे का दायाँ हाथ ऐसी मुद्रा में उठा है जिसका अर्थ है "डरो मत।"
- नीचे झुका हाथ, जो उठे हुए पैर की ओर इशारा करता है। नीचे का बायाँ हाथ उठे हुए बाएँ पैर की ओर संकेत करता है, जिसे मुक्ति और शरण का प्रतीक माना जाता है।
- लपटों का घेरा। नर्तक के चारों ओर का अग्नि-वृत्त गतिशील ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है—परिवर्तन का वह संसार जिसमें यह नृत्य होता है।
- लहराती जटाएँ। जटाएँ बाहर की ओर उड़ रही हैं, और कई प्रतिमाओं में उनमें गंगा दिखाई देती हैं। अर्धचंद्र भी वहीं है।
- शांत मुख। चेहरे के भाव को देखिए। अंगों में गति है, फिर भी चेहरा स्थिर है।
यही आखिरी बारीकी अक्सर लोगों को याद रह जाती है। शरीर पूरी तरह गतिशील है और चेहरा शांत।
चिदंबरम: जिसे इस नृत्य का धाम माना जाता है
तमिल परंपरा शिव के नृत्य का स्थान तमिलनाडु के चिदंबरम को मानती है। यहाँ शिव की नटराज के रूप में पूजा होती है, और यहाँ का मंदिर दक्षिण भारत के सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, पतंजलि और व्याघ्रपाद नाम के दो ऋषियों ने ब्रह्मांडीय नृत्य देखने की प्रार्थना की थी। शिव ने उनकी इच्छा पूरी की और वहाँ उनके लिए नृत्य किया।
चिदंबरम शिव के अलग-अलग नृत्यों से जुड़ी पाँच सभाओं में से भी एक है। चिदंबरम की सभा को कनक सभा, यानी स्वर्ण सभा कहा जाता है। इस मंदिर के बारे में हम आगे किसी लेख में लिखेंगे।
एक नृत्य, अनेक अर्थ
लोगों ने इस प्रतिमा में अलग-अलग अर्थ पाए हैं।
- भक्त इसमें प्रभु को देखते हैं, जो संसार की हर गति में उपस्थित हैं और जिन तक पहुँचना संभव है।
- नर्तक इसमें अपनी कला का उद्गम देखते हैं, और अनेक शास्त्रीय नर्तक नटराज को प्रणाम करके अपना अभ्यास शुरू करते हैं।
- दार्शनिक इसमें अनित्यता का चित्र देखते हैं। सब कुछ उत्पन्न होता है, कुछ समय ठहरता है और फिर विलीन हो जाता है; इन सबके पीछे एक निश्चलता है।
- वैज्ञानिक और लेखक इसमें ऐसे ब्रह्मांड का चित्र देखकर आकर्षित हुए हैं जो स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर गतिमान है।
इनमें से कोई भी व्याख्या दूसरी को नकारती नहीं है। ये एक ही रूप को देखने के अलग-अलग तरीके हैं।
इस कथा का असली मर्म
हम अक्सर ऐसी सीधी-साफ़ कथा चाहते हैं जिसमें कुछ नष्ट होता है और कुछ रचा जाता है, और दोनों अलग-अलग हों। तांडव ऐसा नहीं होने देता। वह डमरू और अग्नि को एक ही शरीर में, एक ही क्षण में रख देता है।
जिस किसी ने जीवन में किसी बड़े अंत का अनुभव किया हो—नौकरी का, किसी रिश्ते का या जीवन के किसी दौर का—उसके लिए यह रूप सांत्वना देने वाला है। अंत और आरंभ दो अलग घटनाएँ नहीं हैं। वे एक ही प्रवाह के दो पहलू हैं, और उसके केंद्र में एक ऐसी निश्चलता है जो डगमगाती नहीं।
अगली बार जब आप इस नृत्यमय रूप को देखें, तो पहले चेहरे को देखिए। फिर पैरों को।
उनके हाथ में थमे डमरू की अपनी एक कथा है: पढ़ें: डमरू सृष्टि की ध्वनि का प्रतीक क्यों है।
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