सीख
भस्म जीवन की अनित्यता का प्रतीक क्यों है
7 मिनट में पढ़ें
शिव को भस्म से लिपटा हुआ दिखाया जाता है। उनके माथे पर तीन रेखाओं में, वक्ष पर और भुजाओं पर भस्म लगी होती है। पारंपरिक चित्रणों में वे किसी निर्जन पर्वत या श्मशान में बैठे दिखाई देते हैं, शरीर पर भस्म के सिवा कुछ नहीं। भक्त इसे माथे पर लगाते हैं। संन्यासी इसे पूरे शरीर पर मलते हैं।
इस परंपरा से अनजान किसी व्यक्ति को यह अजीब, यहाँ तक कि भयावह भी लग सकता है। परंपरा के इतने प्रिय देवता अग्नि के बाद बची राख को ही क्यों धारण करेंगे? इसका उत्तर इस परंपरा की सबसे उपयोगी सीखों में से एक है, और पहली नज़र में जितना कठोर लगता है, वास्तव में उससे कहीं अधिक सौम्य है।
भस्म क्या है
भस्म राख के लिए संस्कृत शब्द है। रोज़मर्रा की पूजा में इसे विभूति भी कहते हैं, जिसका अर्थ है "महिमा" या "तेज"। अक्सर दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक ही चीज़ के लिए होता है।
पूजा में इस्तेमाल होने वाली भस्म आम तौर पर पारंपरिक विधि से तैयार की जाती है। प्रचलित विवरणों के अनुसार, इसे पवित्र अग्नि की राख से या अनुष्ठानपूर्वक जलाए गए सूखे गोबर से बनाया जाता है। कभी-कभी इसमें दूसरी सामग्रियाँ भी मिलाई जाती हैं। इसकी विधियाँ क्षेत्र, समुदाय और मंदिर के अनुसार अलग होती हैं, और इसे तैयार करना भी अक्सर अपने आप में एक अनुष्ठान माना जाता है।
ध्यान रखें कि यह पूजा के लिए बनाई गई भस्म है। यह मृतकों की राख नहीं है, और सामान्य भक्त इस तरह की किसी चीज़ का उपयोग नहीं करते।
जब सब जल जाता है, तब क्या बचता है
सोचिए कि राख वास्तव में क्या है। लकड़ी, घास, गाय से मिला गोबर—कुछ भी पूरी तरह जलने के बाद राख बन जाता है। रूप मिट जाने के बाद जो बचता है, वही राख है।
और राख अपने आप में अनोखी है। उसे दोबारा जलाया नहीं जा सकता। अग्नि अपना काम कर चुकी होती है। जो बचता है, वह उस पदार्थ की अंतिम अवस्था है—वह रूप, जो बाकी सब मिट जाने के बाद रह जाता है।
यही इस प्रतीक का मूल भाव है। शरीर, नाम, संपत्ति, पदवी—ये सब रूप हैं। ये आते हैं, कुछ समय टिकते हैं और फिर मिट जाते हैं। भस्म इसी की याद दिलाती है, और इसे धारण करने वाले के साथ यह स्मरण हमेशा बना रहता है।
शिव इसे क्यों धारण करते हैं
शिव को महाकाल, यानी काल का स्वामी कहा जाता है, और वे संहार के अधिपति हैं। उनके चित्रण में वे ऐसे देवता हैं जो अंत से भयभीत नहीं होते। परंपरा उन्हें श्मशान में स्थित दिखाती है—भयावह जगह के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी जगह के रूप में जहाँ भ्रम समाप्त हो जाते हैं।
कुछ परंपराओं में एक कथा मिलती है कि शिव अपनी तीसरी आँख से कामदेव को भस्म करने के बाद उनके जले हुए शरीर की राख धारण करते हैं। इस प्रसंग की चर्चा अहंकार और महत्वाकांक्षा पर हमारे चिंतन में भी है। दूसरी परंपराएँ इसे अलग तरह से बताती हैं, और भस्म को त्यागी संन्यासी का चिह्न भी माना जाता है।
दोनों व्याख्याओं का सार एक ही है। जो भस्म धारण करता है, उसके पास बचाकर रखने को कुछ नहीं है। वह ऐसी किसी चीज़ से चिपका नहीं है जिसे समय छीन सकता है।
यह निराशा का संदेश नहीं है
इन सारी बातों को मृत्यु और उदासी से जोड़कर देखना आसान है। लेकिन परंपरा भस्म का उपयोग लोगों को दुखी करने के लिए नहीं करती। वह इसका उपयोग उन्हें मुक्त करने के लिए करती है।
जब आपको याद रहता है कि सब कुछ बदलता है, तो आपके नज़रिए में कुछ बदलाव आते हैं:
- चिंताएँ छोटी लगने लगती हैं। जिन बातों पर हमारी नींद उड़ जाती है, उनमें से बहुत-सी दस साल बाद मायने नहीं रखेंगी, और सौ साल बाद उनमें से कोई भी मायने नहीं रखेगी।
- समय अनमोल लगने लगता है। यदि कोई रूप हमेशा नहीं टिकता, तो आपके पास जो दिन हैं, उन्हें पूरे मन से जीना सार्थक है।
- आसक्ति ढीली पड़ती है। आप लोगों, काम और चीज़ों से अब भी पूरी तरह प्रेम कर सकते हैं, लेकिन उन पर अपनी पकड़ थोड़ी हल्की रख सकते हैं।
- अंत का डर कम होने लगता है। इस नज़रिए से देखें तो अंत जीवन के क्रम का हिस्सा है, उसकी विफलता नहीं।
भस्म कोई चेतावनी नहीं है। यह उस पुराने मित्र जैसी है जो बार-बार याद दिलाता है कि वास्तव में क्या मायने रखता है।
तीन रेखाएँ
भस्म अधिकतर माथे पर तीन आड़ी रेखाओं के रूप में लगाई जाती है, जिन्हें त्रिपुंड्र कहते हैं। अलग-अलग गुरु इन तीन रेखाओं का अर्थ अलग-अलग ढंग से बताते हैं। कुछ इन्हें तीन गुणों, काल की तीन अवस्थाओं या तीन लोकों से जोड़ते हैं। ये व्याख्याएँ हैं, नियम नहीं। आपकी अपनी पारिवारिक परंपरा में इनका कोई और अर्थ भी बताया जा सकता है।
भक्त इसे कैसे धारण करते हैं
रीति-रिवाज अलग-अलग होते हैं, और अपने परिवार या मंदिर की परंपरा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक सामान्य तरीका इस तरह है:
- स्वच्छ और सही विधि से तैयार भस्म का उपयोग करें। किसी भरोसेमंद स्रोत, जैसे मंदिर या विश्वसनीय विक्रेता से ली गई भस्म की थोड़ी-सी चुटकी लें।
- शांत मन से लगाएँ। बहुत-से लोग इसे लगाते समय धीमे स्वर में "ॐ नमः शिवाय" का जप करते हैं।
- दाएँ हाथ की उँगलियों से लगाएँ। एक प्रचलित तरीका है बीच की तीन उँगलियों से माथे पर बाएँ से दाएँ रेखाएँ खींचना। कुछ परंपराओं में दूसरी उँगलियों या अलग मुद्राओं का उपयोग होता है, और कुछ में इसे भुजाओं या वक्ष पर भी लगाया जाता है।
- इसे सम्मान से सँभालें। ज़मीन पर न फेंकें और न ही लापरवाही से बरतें।
कुछ लोग माथे के बीच में थोड़ी-सी भस्म लगाते हैं या सिर पर रखते हैं। दोनों प्रथाएँ देखने को मिलती हैं। यदि आपको तरीका न पता हो, तो पुजारी को देखकर सीखें या विनम्रता से पूछ लें।
कुछ व्यावहारिक बातें
- त्वचा और आँखें। भस्म से संवेदनशील त्वचा या आँखों में जलन हो सकती है। कोई प्रतिक्रिया दिखे तो इसका उपयोग बंद कर दें और उस हिस्से को धो लें। बाज़ार में मिलने वाले कुछ उत्पादों में अतिरिक्त पदार्थ मिले होते हैं, इसलिए स्रोत की जाँच करना समझदारी है।
- एलर्जी और साँस की समस्याएँ। यदि आपको दमा या साँस से जुड़ी कोई बीमारी है, तो बारीक चूर्ण को साँस के साथ भीतर जाने से बचाएँ। इसे चेहरे से दूर रखते हुए लगाएँ।
- यह कहाँ से आती है। चमत्कारी इलाज जैसे बड़े-बड़े दावे करने वाले उत्पादों से सावधान रहें। भस्म भक्ति की वस्तु है, दवा नहीं।
महाकालेश्वर में भस्म
मंदिर के अनुष्ठानों में भी भस्म का स्थान है। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भोर से पहले होने वाली भस्म आरती के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें शिवलिंग का भस्म से शृंगार किया जाता है। किस तरह की भस्म इस्तेमाल होती है और श्रद्धालु इसमें कैसे भाग ले सकते हैं, इसके विवरण अलग-अलग मिलते हैं और समय के साथ बदलते भी रहे हैं। यदि आप इसमें शामिल होने की योजना बना रहे हैं, तो वर्तमान नियमों और बुकिंग की व्यवस्था के बारे में मंदिर के आधिकारिक माध्यमों से जानकारी लें। मंदिर के बारे में अधिक विस्तार से महाकालेश्वर पर हमारे लेख में बताया गया है।
कठिन समय के लिए एक बात
चूँकि भस्म हमें अंत की याद दिलाती है, इसलिए शोक के समय यह सीख अलग तरह से महसूस हो सकती है। यदि आपने हाल ही में किसी अपने को खोया है, तो शायद आप अनित्यता के बारे में सोचना न चाहें। यह पूरी तरह समझ में आता है। शोक पर ज़बरदस्ती कोई आध्यात्मिक अर्थ थोपने की ज़रूरत नहीं है। यदि उदासी बहुत भारी लगे, लंबे समय तक बनी रहे या आपकी नींद अथवा रोज़मर्रा के जीवन पर असर डाले, तो कृपया किसी डॉक्टर या परामर्शदाता से बात करें और अपने करीबी लोगों का सहारा लें।
भस्म क्या सिखाती है
यही कि हर रूप बदलता है, और यह निराश होने का कारण नहीं है। कि जो आसक्ति छोड़ चुका है, वही मुक्त है। और यह कि हर अग्नि के बुझने पर कुछ ऐसा बचता है, जिसे अब जलाया नहीं जा सकता।
शिव के माथे की भस्म कुछ खो देने का प्रतीक नहीं है। यह उस चीज़ का प्रतीक है जो तब बचती है, जब आपको खोने का डर नहीं रह जाता।
जब किसी अंत का दुख भारी लगे: पढ़ें: अपनों को खोने के दुख से जूझना: पीड़ा को सँभालने के बारे में नीलकंठ क्या सिखाते हैं।
घर पर पूजा की तैयारी कर रहे हैं? मुफ़्त डाउनलोड करें घर पर सरल पूजा की जाँच-सूची।

